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Dr. Varsha Singh |
रोशनी लाओ ज़रा
-डॉ. वर्षा सिंह
धूप इक पल ही सही, लाओ ज़रा
है अंधेरा, रोशनी लाओ ज़रा
आंख और पलकों के रिश्ते की तरह
उम्र भर की दोस्ती लाओ ज़रा
ग़म मिले कितने, किसे, इस इश्क़ में
वक़्त की खाता-बही लाओ ज़रा
आंधियां झुककर नमन जिसको करें
निश्चयों की आरती लाओ ज़रा
सूखती फसलें, झुलसती चेतना
लहलहाती ज़िन्दगी लाओ ज़रा
किस क़दर गुमसुम हुआ बचपन यहां
एक मुट्ठी ही ख़ुशी लाओ ज़रा
बन के "वर्षा" तुम भगीरथ की तरह
आज धरती पर नदी लाओ ज़रा
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(मेरे ग़ज़ल संग्रह "सच तो ये है" से)
बहुत शुक्रिया प्रिय दिव्या अग्रवाल जी 🙏
जवाब देंहटाएंबहुत सुन्दर
जवाब देंहटाएंबहुत धन्यवाद आदरणीय सुशील कुमार जोशी जी 🙏
हटाएंबेहतरीन सृजन
जवाब देंहटाएंबहुत धन्यवाद अनुराधा जी 🙏
हटाएंआदरणीय रवीन्द्र सिंह यादव जी,
जवाब देंहटाएंआपने मेरी पोस्ट को चर्चा हेतु चयनित किया, इस हेतु मैं आपकी आभारी हूं।
सादर,
डॉ. वर्षा सिंह
हार्दिक धन्यवाद ओंकार जी 🙏
जवाब देंहटाएंबहुत बेहतरीन ग़ज़ल।
जवाब देंहटाएंबहुत ही सुंदर
जवाब देंहटाएंबहुत शुक्रिया गगन शर्मा जी 🙏
हटाएंआंख और पलकों के रिश्ते की तरह
जवाब देंहटाएंउम्र भर की दोस्ती लाओ ज़रा
अत्यंत सुन्दर सृजन ।
बहुत धन्यवाद प्रिय मीना जी 🙏
हटाएंसूखती फसलें, झुलसती चेतना
जवाब देंहटाएंलहलहाती ज़िन्दगी लाओ ज़रा
किस क़दर गुमसुम हुआ बचपन यहां
एक मुट्ठी ही ख़ुशी लाओ ज़रा
बहुत सुंदर, प्रेरक ग़ज़ल 🌹🙏🌹
शुक्रिया प्रिय बहन डॉ. (सुश्री) शरद सिंह ❤️
हटाएंबहुत ही सुन्दर रचना।
जवाब देंहटाएंबहुत धन्यवाद आदरणीय सान्याल जी 🙏
हटाएंबहुत ही सुंदर सृजन आदरणीय दी।
जवाब देंहटाएंसादर
बहुत धन्यवाद प्रिय अनीता सैनी जी 🙏
हटाएंबहुत सुंदर सृजन है वर्षा जी,
जवाब देंहटाएंहथियार नहीं डालने किसी भी जंग में
उठाके नये कुछ आयुद्ध लाओ जरा।।
हौसले को नमन सुंदर भावों को नमन।
अप्रतिम सृजन।
आपके उद्गार उत्साहित करने वाले हैं। बहुत धन्यवाद आदरणीय कुसुम. कोठरी जी 🙏
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