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Dr. Varsha Singh |
कोई छू कर गया
- डॉ. वर्षा सिंह
काश, खिड़की तो इक ज़रा खुलती
फिर से उम्मीद की हवा चलती
इस क़दर है उदास बाग़ीचा
फूल महका न अब कली खिलती
कोई छू कर गया ख़यालों में
चूनरी देर तक रही ढलती
आईने में वही नज़र आता
मेरी सूरत मुझे नहीं मिलती
मन कभी क़ैद में नहीं रहता
लोग कह दें भले इसे ग़लती
रात भर जागती रही "वर्षा"
दूर कंदील इक रही जलती
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(मेरे ग़ज़ल संग्रह "सच तो ये है" से)
बहुत लाजवाब शेर हैं ... कमाल की गज़ल ...
जवाब देंहटाएंहार्दिक धन्यवाद आदरणीय दिगम्बर नासवा जी 🙏
हटाएंसादर नमस्कार,
जवाब देंहटाएंआपकी प्रविष्टि् की चर्चा शुक्रवार ( 08-01-2021) को "आम सा ये आदमी जो अड़ गया." (चर्चा अंक- 3940) पर होगी। आप भी सादर आमंत्रित हैं।
धन्यवाद.
…
"मीना भारद्वाज"
बहुत -बहुत आभार प्रिय मीना भारद्वाज जी 🙏
हटाएंवाह
जवाब देंहटाएंबहुत धन्यवाद जोशी जी ��
हटाएंआशा का संचार करती बेहतरीन ग़ज़ल।
जवाब देंहटाएंबहुत-बहुत धन्यवाद आदरणीय शास्त्री जी 🙏
हटाएंलाजवाब गजल
जवाब देंहटाएंबहुत शुक्रिया माथुर जी 🙏
हटाएंआईने में वही नज़र आता
जवाब देंहटाएंमेरी सूरत मुझे नहीं मिलती
मन कभी क़ैद में नहीं रहता
लोग कह दें भले इसे ग़लती
शानदार ग़ज़ल...🌹🙏🌹
बहुत शुक्रिया प्रिय बहन डॉ. (सुश्री) शरद सिंह 🌹❤️🌹
हटाएंबहुत सुंदर गजल।
जवाब देंहटाएंहार्दिक धन्यवाद प्रिय ज्योति जी 🙏🌹🙏
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