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Dr. Varsha Singh |
फ़िज़ूल है
-डॉ. वर्षा सिंह
गुजर गई जो ज़िन्दगी, पुकारना फ़िज़ूल है
खंडहरों के द्वार को बुहारना फ़िज़ूल है
कहीं धुआं, कहीं है लौ, कहीं पे सिर्फ राख है
बुझी-बुझी कथाओं को संवारना फ़िज़ूल है
हृदय के द्वार बंद कर स्वयं से हो गए जुदा
मंदिरों में देवता, निहारना फ़िज़ूल है
तटस्थ हो चुका है मन ऊब कर व्यथाओं से
नदी की धार पर इसे उतारना फ़िज़ूल है
निरस्त हो गई हैं "वर्षा" मौसमों की अर्जियां
समय का फेर है इसे नकारना फ़िज़ूल है
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(मेरे ग़ज़ल संग्रह "सच तो ये है" से)
आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 28.01.2021 को चर्चा मंच पर दिया जाएगा| आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ाएगी
जवाब देंहटाएंधन्यवाद
आदरणीय दिलबागसिंह विर्क जी,
हटाएंमुझे प्रसन्नता है कि आपने मेरी इस ग़ज़ल का चयन चर्चा मंच के लिए किया है।
हार्दिक आभार
एवं
अनंत शुभकामनाएं 🙏
सादर,
डॉ. वर्षा सिंह
बहुत धन्यवाद आदरणीय जोशी जी 🙏
जवाब देंहटाएं"गुजर गई जो ज़िन्दगी, पुकारना फ़िज़ूल है
जवाब देंहटाएंखंडहरों के द्वार को बुहारना फ़िज़ूल है"
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बेहतरीन ग़ज़ल।
बहुत शुक्रिया आदरणीय 🙏
हटाएंवाह!बेहतरीन आदरणीय दी।
जवाब देंहटाएंसादर
बहुत धन्यवाद प्रिय अनीता जी 🙏
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