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शुक्रवार, दिसंबर 11, 2020

गंगा | कुछ ग़ज़लें | कुछ शेर | डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

ग़ज़लों में गंगा की उपस्थिति
       - डॉ. वर्षा सिंह

देवि सुरेश्वरि भगवति गङ्गे त्रिभुवनतारिणि तरलतरङ्गे ।
शङ्करमौलिविहारिणि विमले मम मतिरास्तां तव पदकमले ।।

अर्थात्  हे देवी सुरेश्वरी ! भगवती गंगे ! आप तीनों लोकों को तारने वाली हैं । शुद्ध तरंगों से युक्त, महादेव शंकर के मस्तक पर विहार करनेवाली, हे मां ! मेरा मन सदैव आपके चरण कमलों में केन्द्रित है ।

धार्मिक, पौराणिक ग्रंथों में देवी के रूप में अतिपूजनीय गंगा भौगोलिक दृष्टि से यूं तो एक पवित्र नदी है। हिमालय पर्वत पर स्थित गोमुख में गंगोत्री ग्लेशियर से उत्पन्न हो कर बंगाल की खाड़ी में मिलने से पूर्व गंगा 2525 किमी का मार्ग तय करती है। अपनी इस यात्रा के दौरान गंगा देश के अनेक तीर्थ स्थलों से हो कर गुज़रती है।

किन्तु गंगा मात्र नदी नहीं है। वह तो भारतीय संस्कृति और संस्कार है, जो जीवन में भौतिक अध्यात्मिक दैनिक वैचारिक पवित्रता के महत्व को स्थापित करती है। जाति-धर्म के बंधनों से परे कल्पना और यथार्थ के समवेत स्वरों को अपनी गजलों में पिरोने वाले शायरों ने भी गंगा  को अपनी ग़ज़लों में विशेष महत्व दिया है। 
 
दुष्यंत कुमार की बहुचर्चित ग़ज़ल के ये शेर जिसमें गंगा की मौज़ूदगी क्रांति का पर्याय है, साहित्यप्रेमियों के साथ-साथ राजनीतिक उद्बोधनों में अनेक बार दोहरायी जाती है - 

हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए
      - दुष्यंत कुमार

ऐसे अनेक कवि/ शायर हैं जिन्होंने किसी न किसी रूप में अपनी ग़ज़लों, अपनी शायरी में गंगा का ज़िक्र किया है।आज यहां प्रस्तुत है ग़ज़लों, शेरों में गंगा की उपस्थिति की बानगी - 

होश-ओ-ख़िरद क्या जोश-ए-जुनूँ क्या उल्टी गंगा बहती है
क्या फ़रज़ाने कैसे सियाने यारो सब दीवाने हैं
     - फ़िराक़ गोरखपुरी

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एक राजा ने उतारी थी ज़मीं पर गंगा
इक नदी दुख में है आँखों से रवाँ हैरत है
      - दख़लन भोपाली

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जब भी वो पाकीज़ा दामन आ जाएगा हाथ मिरे
आँखों का ये मैला पानी गंगा-जल हो जाएगा
     - ताहिर फ़राज़

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आग के इक क़लम की सियाही लगा
जो धुआँ 'नूर' गंगा किनारे उठा
     - कृष्ण बिहारी नूर

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जब जब ख़ुद को क़त्ल करें
ख़ंजर गंगा में धो लें
    - अंजुम लुधियानवी

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हुस्न बना जब बहती गंगा
इश्क़ हुआ काग़ज़ की नाव
     - इब्न-ए-सफ़ी

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आज पलकों को जाते हैं आँसू
उल्टी गंगा बहाते हैं आँसू
     - मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

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जो पराई पीर में "नीरज" बहा
अश्क का क़तरा वही गंगा हुआ
     - नीरज गोस्वामी

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कभी सहरा कभी समुंदर है
कभी गंगा के आब जैसा इश्क़
     - जगदीश प्रकाश

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अब तो गंदा नाला हूँ
पहले मैं गंगा-जल था
    - शाहिद अज़ीज़

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धरती पर सुख चैन की ख़ातिर मन के मैल को साफ़ करो
गंगा जल में जिस्म को अपने नहलाने से क्या होगा
      - मक़सूद अनवर मक़सूद

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झुक के मुँह अपना जो गंगा में ज़रा देख ले तू 
निथरे पानी का मज़ा और भी मीठा हो जाए 
      - जोश मलीहाबादी

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वो अब पानी को तरसेंगे जो गंगा छोड़ आये हैं,
हरे झंडे के चक्कर में तिरंगा छोड़ आये हैं
      - राहत इंदौरी

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मेरा गंगा का देश, मेरा यमुना के देश
मेरी धरती का आँचल हरा है

तन में महके सुमन, मन में चंदन के वन
जहाँ रूप का झरना झरा है
       - कुँअर बेचैन

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बहती हुई गंगा तिरे पानी में नहा कर
अपने लिए नेकी न कमा लें कोई हम भी
     - अज़लान शाह

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गर निकलती मिरे अरमान की कोई गंगा
फिर तो सहराओं के क्या ख़ूब नज़ारे होते
    - शिव ओम "अम्बर"

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ये सोग ख़त्म किया जाए या किया जाए
तुम्हारे हिज्र को गंगा बहा दिया जाए
    - सय्यद ज़ामिन अब्बास काज़मी

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गंगा जमुना की लहरों में सात सुरों के सरगम
ताज एलोरा जैसे सुंदर तस्वीरों के एल्बम
      - ज़ुबैर रिज़वी

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हर आँख लहू सागर है मियाँ हर दिल पत्थर सन्नाटा है
ये गंगा किस ने पाटी है ये पर्बत किस ने काटा है
    - अज़ीज़ क़ैसी

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उसके खारेपन में कोई तो,कशिश होगी ज़रूर
वरना क्यूं सागर से जाके गंगाजल मिलता रहा 
   - अज्ञात

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स्वर्ग से धरती पर आयी
इंसान की हर खुशियां लायी
घर घर में जाकर मां गंगा
सबको ही पावन कर आयी
- विजय लक्ष्मी पाठक

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खूब बहती है, अमन की गंगा बहने दो
मत फैलाओ देश में दंगा रहने दो

लाल हरे रंग में ना बांटो हमको
मेरे छत पर एक तिरंगा रहने दो…!!
 - निशांत

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'सख़ी' रोते ही रोते दम निकल जाए
फ़राग़त हो कहीं गंगा नहाएँ
      - सख़ी लख़नवी

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ये आशिक़ अपने अपने अश्क को तूफ़ान कहते हैं
जो सच पूछो तो ये गंगा हमारी ही खुदाई है
      - मीर सोज़

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यूँ चढ़ा जूता कस कमर हो चले
जब से गंगा के पार जाते हो
     - मिर्ज़ा अज़फ़री

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हमारा ख़ून का रिश्ता है सरहदों का नहीं
हमारे ख़ून में गंगा भी है चनाब भी है
     - कँवल ज़ियाई

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बुझ जाएगी मिल-जुल के अगर प्यास बुझाओ
गंगा ही के नज़दीक तो है रूद-ए-जमन भी
      - दर्शन सिंह

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रह-ए-हयात न तय हो सकी तो जमुना ने
सुना है डूब के गंगा में ख़ुद-कुशी कर ली
     - सीन शीन आलम

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मेरे बच्चो इस ख़ित्ते में प्यार की गंगा बहती थी
देखो इस तस्वीर को देखो ये तस्वीर पुरानी है
    - आलम ख़ुर्शीद

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लुत्फ़ तो जब है वो ख़ुद नवाज़े
कहा बहती गंगा में हाथ धोना
    - मानी नागपुरी

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कौन सी गंगा नहाया है ये सूरज
जब भी आया है तो क़त्ल-ए-आम ले कर
     - सरदार पंछी

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एक जोगन ने बहा कर ज्ञान की गंगा कहा
ज्ञान ही कैलाश है शंकर को पाने के लिए
    - पंकज सरहदी

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एक परिंदा चीख़ रहा था मस्जिद के मीनारे पर
दूर कहीं गंगा के किनारे आस का सूरज ढलता था
    - नूर बिजनौरी

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गंगा के पानियों सा पवित्र कहें जिसे
आँखों के तट पे तैरता है जो गया बदन
      - प्रेम कुमार नज़र

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चलते रह जाते हैं रोज़ ओ शब के धंदे
गंगा उल्टी सीधी बहती रह जाती है
     - ख़ावर जीलानी

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चलता रहा मैं रेत पे प्यासा तन-ए-तन्हा
बहती रही कुछ दूर पे इक प्यार की गंगा
     - बाक़र मेहदी

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रहेंगे न मल्लाह ये दिन सदा
कोई दिन में गंगा उतर जाएगी
    - अल्ताफ़ हुसैन हाली

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डरता हूं रुक न जाये कविता की बहती धारा
मैली है जब से गंगा, मैला है मन हमारा

छाती पे आज उसकी कतवार तैरते हैं
राजा सगर के बेटो तुम सबको जिसने तारा

कब्ज़ा है आज इस पर भैंसों की गन्दगी का
स्नान करने वालों जिस पर है हक़ तुम्हारा
        - नज़ीर बनारसी 

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प्यार पंछी सोच पिंजरा दोनों अपने साथ हैं,

एक सच्चा, एक झूठा, दोनों अपने साथ हैं,

आसमाँ के साथ हमको ये जमीं भी चाहिए,
भोर बिटिया, साँझ माता दोनों अपने साथ हैं।

आग की दस्तार बाँधी, फूल की बारिश हुई,
धूप पर्वत, शाम झरना, दोनों अपने साथ हैं।

ये बदन की दुनियादारी और मेरा दरवेश दिल,
झूठ माटी, साँच सोना, दोनों अपने साथ हैं।

वो जवानी चार दिन की चाँदनी थी अब कहाँ,
आज बचपन और बुढ़ापा दोनों अपने साथ हैं।

मेरा और सूरज का रिश्ता बाप बेटे का सफ़र,
चंदा मामा, गंगा मैया, दोनों अपने साथ हैं।

जो मिला वो खो गया, जो खो गया वो मिल गया,
आने वाला, जाने वाला, दोनों अपने साथ हैं।
           - बशीर बद्र

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अब तो मज़हब कोई, ऐसा भी चलाया जाए
जिसमें इनसान को, इनसान बनाया जाए

आग बहती है यहां, गंगा में, झेलम में भी
कोई बतलाए, कहां जाकर नहाया जाए

प्यार का ख़ून हुआ क्यों ये समझने के लिए
हर अँधेरे को उजाले में बुलाया जाए

मेरे दुख-दर्द का तुझ पर हो असर कुछ ऐसा
मैं रहूँ भूखा तो तुझसे भी न खाया जाए

गीत उन्मन है, ग़ज़ल चुप है, रूबाई है दुखी
ऐसे माहौल में ‘नीरज’ को बुलाया जाए।
     - गोपालदास 'नीरज'

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ऋषि-मुनियों ने शीश नवाया,
शिव का वो संसार कहाँ ?
कलकल-छलछल, बहती अविरल, गंगा की वो धार कहाँ ?

अर्पण-तर्पण करने वाली, सरल-विरल चंचल-मतवाली,
पौधों में भरती हरियाली, अमल-धवल आधार कहाँ ?

भरा प्रदूषण इसमें भारी, नष्ट हुई पावनता सारी
जिसका करते थे अभिनन्दन, कुदरत का शृंगार कहाँ ?
    - रूपचंद्र शास्त्री "मयंक"


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इसकी दुनिया, उसकी दुनिया, जाने किसकी किसकी दुनिया
कोई कहता रब की दुनिया तो कोई इंसानी दुनिया 

जुरासिक युग से कलियुग तक जाने कितने रूप धर चुकी 
यही पढ़ा है, यही सुना है, है ये बहुत पुरानी दुनिया 

हीर-सोहनी, रांझा-माही स्मृतियों में आते-जाते 
श्रद्धा मनु या आदम हव्वा, लगती प्रेम कहानी दुनिया 

दुख का सागर बड़ा-बड़ा सा, सुख की गंगा एकदम छोटी 
दिल टूटे तो पत्थर दुनिया, वरना बहता पानी दुनिया 

दुनिया को लेकर जो लड़ते उनको कोई तो समझाए 
सूफी संतों का कहना है बिना प्रेम है फ़ानी दुनिया 

मिलने और बिछड़ने के भी ढेरों किस्से यहां भरे हैं 
"शरद" जानती केवल इतना यह है आनी- जानी दुनिया
       - डॉ.(सुश्री) शरद सिंह


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पोंछ दो आंसू किसी के है जो पश्चाताप
व्यर्थ ही गंगाजली से धो रहे हो पाप

सामना कैसे करूँगा सोच कर जाता नहीं
माँ मेरी रोती बहुत है थक चुका है बाप

चाँद की तो दूरियों को नापना आसान है
बात है दिल की अगर गहराइयों को नाप

लोग जो निर्माण करते हैं पसीने से डगर
वक़्त की बंज़र ज़मीं पर छोड़ जाते छाप
     - दिगम्बर नासवा


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पोर-पोर में पीर समाया
किसने है ये तीर चुभाया !

मन का हाल नहीं पूछा और
पूछा किसने धीर चुराया !

गूँगी इच्छा का मोल ही क्या
गंगा का बस नीर बताया !

नहीं कभी कोई राँझा उसका
फिर भी सबने हीर बुलाया !

न भूली शब्दों की भाषा 'शब'
किसी बोल ने चीर तड़पाया !
       - जेन्नी शबनम

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और अंत में मेरी यानी इस ब्लॉग लेखिका डॉ. वर्षा सिंह की ग़ज़लें -

(1)
अपने गांव-शहर का पत्थर भला सभी को लगता है
चाक हृदय हो जाता है जब कभी कहीं वह बिकता है

पकने को दोनों पकते हैं, फ़र्क यही बस होता है
नॉनस्टिक में सुख पकते हैं, हांडी में दुख पकता है

गंगा घाट निवासी भैया, सागर के दुख क्या जानो
जग के दर्द छिपाए मन में, सबसे हंस कर मिलता है

तथाकथित चाहत का मलबा ढोना भी है नादानी
"वर्षा" के सपनों में लेकिन सावन हरदम पलता है
      - डॉ. वर्षा सिंह

(2)
बिजलियों पर चला, चांदनी में जला
एक मन सैकड़ों जुगनुओं में ढला

ख़ूब उतरी ढलानें, चढ़ी चोटियां
चाहतों का मगर कब रुका काफ़िला

इक नदी, दो किनारे  ख़ुशी- जिंदगी 
बीच दोनों के है उम्र का फ़ासला 

ओढ़नी के कसीदे को यह है पता 
मेरी बिंदिया में वो ही रहा झिलमिला

धूप जीने का अंदाज भी आ गया 
राह में गुलमोहर हंस के जब भी मिला

छोड़ कर नर्मदा, जा के गंगा लगा
लोग कहते हैं "वर्षा" का मन बावला
      - डॉ. वर्षा सिंह

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मंगलवार, दिसंबर 08, 2020

किसान | अन्नदाता | ग़ज़ल | शायरी | डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

ग़ज़लों के आईने में किसान
             - डॉ. वर्षा सिंह

हमारा देश कृषि प्रधान देश है और किसान हमारे अन्नदाता हैं। परिस्थितियोंवश इन दिनों किसान आंदोलन से पूरे देश प्रभावित हो रहा है। नित नए समाचार, बहसें, दलीलें और चर्चाएं... नए कृषि कानूनों को वापस लेने और फसल के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की गारंटी की मांग को लेकर किसान आंदोलन कर रहे हैं ।
आज 08 दिसम्बर को किसान संगठनों के आह्वान पर "भारत बंद" की सरगर्मी है। 
तो प्रिय ब्लॉग पाठकों, मैं आज यहां अपने इस ब्लॉग "ग़ज़लयात्रा" में प्रस्तुत कर रही हूं हमारे अन्नदाता किसानों के प्रति समर्पित कुछ चुनिंदा कवियों/शायरों की शायरी और ग़ज़लें।

हलाल रिज़्क़ का मतलब किसान से पूछो 
पसीना बन के बदन से लहू निकलता है
      - आदिल रशीद

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शाइ'र हूँ मैं लफ़्ज़ों का मसीहा
ऐ काश मैं इक किसान होता
      - रिफ़अत सरोश

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हंसिये की ज़ंग छुड़ाने में रत हैं किसान
है नई नोक दे रहा है मजूर कुदाली को
नभ बसा रहा है नए सितारों की बस्ती
भू लिए गोद में नए ख़ून की लाली को.
            - गोपालदास 'नीरज'

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तिरे किसान के सीने में हसरतों का हुजूम
तिरी फ़ज़ाओं में हर बेटी माँ बहन मग़्मूम
   - यूसुफ़ राहत

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ईंट उगती देख अपने खेत में
रो पड़ा है आज दिल किसान का
     - इरशाद ख़ान सिकंदर

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बारिश में खेत ऐसी तरह से नहाए है
रौनक़ हर इक किसान के चेहरे पे आए है
    - नज़ीर बनारसी

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बनाएँगे नई दुनिया किसान और मज़दूर
यही सजाएँगे दीवान-ए-आम-ए-आज़ादी
    - फ़िराक़ गोरखपुरी

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मिला न खेत से उस को भी आब-ओ-दाना क्या
किसान शहर को फिर इक हुआ रवाना क्या
    - सौरभ शेखर

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बारिशें जाड़े की और तन्हा बहुत मेरा किसान
जिस्म और इकलौता कम्बल भीगता है साथ साथ
     - परवीन शाकिर

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गंदुम की बालियों से बहुत रौशनी हुई
इस रौशनी से क़र्ज़ न उतरा किसान का
     - अहमद फ़ाख़िर

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मैं वो किसान हूँ खेती पे बर्क़ ने जिस की
दुआ जो मेंह के लिए की तो आग बरसाई
     - शाद लखनवी

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मशीन बोना है जिन का पेशा उन्हें ज़मीं बेच दी है तुम ने
किसान हो कर ख़ुद अपनी मिट्टी पलीद करने की ठान ली है
   - ऐनुद्दीन आज़िम

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हो 'फ़ख़्र' ख़ाक मुझे क़ौम की तरक़्क़ी पर
जो फ़र्द-ए-क़ौम ये मज़दूर और किसान नहीं
    - फख्र ज़मान

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वो अन्नदाता है, जिसे कहते किसान हैं
यूं तो नहीं है कुछ भी, लेकिन महान हैं
   - अनिल त्रिपाठी

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तमाम एक सी शक्लें हैं हिंदिसों की तरह
किसान हैं जो अभी खेतियों से पलटे हैं
  - अली सरदार जाफ़री

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न ऐसे लौंग घुमा नाक में हसीं मुटियार
जो हल चलाते हैं कोई किसान गिर जाए
  - मुसव्विर सब्ज़वारी

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किसान खेतों से घर न जा पाया सोचता था
इकट्ठी पहले मैं उम्र-भर की कपास कर लूँ
     - ज़ीशान साजिद

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ज़मीन-ए-कर्ब की हर फ़स्ल का जो मालिक है
हमारे दर्द के रिश्ते इसी किसान से हैं
    - रज़ा मौरान्वी

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अभी किसान-ओ-कामगार राज होने वाला है
अभी बहुत जहाँ में काम-काज होने वाला है
   - फ़िराक़ गोरखपुरी

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तमाम फ़सलें उजड़ चुकी हैं न हल बचा है न बैल बाक़ी
किसान गिरवी रखा हुआ है लगान पानी में बह रहा है
   - शकील आज़मी

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ये चारा-गाह ये रेवड़ ये मवेशी ये किसान
सब के सब मेरे हैं सब मेरे हैं सब मेरे हैं
    - साहिर लुधियानवी

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किसान दिल-शाद खेत आबाद हैं वहाँ के
सफ़ेद भेड़ें हैं सब्ज़ चारे हैं उस किनारे
   - शब्बीर शाहिद

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मिले नया सब को एक जीवन चमन खिलें खेत लहलहाएँ
हवा मोहब्बत का राग अलापे किसान धरती के गीत गाएँ
    - नज़ीर बनारसी

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फ़सलों का ख़्वाब भूख की आँखों में रह गया
गाँव के खेत खा गए लेकिन किसान तक
     - ताैफ़ीक़ साग़र

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काँधे पर हल धरे किसान। 
करता खेतों को प्रस्थान।।

मत कहना इसको इंसान।
यह धरती का है भगवान।।
  - डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 

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बाँझ हो जाती है ज़मीं नक़ल बाज़ार की करता है जब किसान 
सरकार को आता है पसीना पसीने की कमाई का भाव  जब माँगता है किसान।  
- रवीन्द्र सिंह यादव 

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किसान की कमर पर मार हथौड़ा ,
प्लास्टिक की बनी  सब्जी-तरकारी,
शौहरत की महक में मरी मानवता ,
दिखावे  में  डूबी  जनता  बेचारी, 
   - अनीता सैनी

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ज़िंदगी में आ गया  मसला बड़ा है
अन्नदाता आज सड़कों पर खड़ा है

जिस तरह सरहद पे रक्षक जूझते हैं
मुश्क़िलातों   से   हमेशा  वो लड़ा है

मूल्य मिल जाए फसल का, कर्ज़ उतरे
हो फ़सल अच्छी, यही दिल में जड़ा है

ख़ुदकुशी करना पड़े जब खेतिहर को
जान लो, वह  दौर  बेहद  ही  कड़ा है

 - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
                
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सियासत नहीं हैं, किसानों की बातें।
तिज़ारत  नहीं हैं, किसानों की बातें।

खेती, किसानी नहीं सब के बस की
नफ़ासत नहीं हैं, किसानों की बातें।

पसीना  बहाए,    लहू  को  सुखाए
शरारत  नहीं हैं, किसानों की बातें।

भले ही  अंगूठा  लगा कर  जिए वो
ज़हालत  नहीं हैं, किसानों की बातें।

जो हक़ मांगने को, उठाए वो बांहें
बग़ावत  नहीं हैं, किसानों की बातें।

'शरद' वो नहीं हैं किसी के भी दुश्मन
अदावत नहीं  हैं,  किसानों की बातें।

             - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

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वो जो कड़वी ज़ुबान होते हैं, 
एक तन्हा मचान होते हैं.

चुप ही रहने में है समझदारी, 
कुछ किवाड़ों में कान होते हैं.

एक दो, तीन चार, बस भी करो, 
लोग चूने का पान होते हैं.

उम्र है लोन, सूद हैं सासें, 
अन्न-दाता, किसान होते हैं.

गोलियाँ, गालियाँ, खड़े तन कर,
फौज के ही जवान होते हैं. 
 
जो नहीं हैं रियाज़ के आदी,
एक टूटी सी तान होते हैं.
 
रख दिए साहूकार पे गिरवी,
हाथ खेतों की धान होते हैं.
           - दिगम्बर नासवा 

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नन्ही -नन्ही बूंदों ने जब अपना राग सुनाया 
व्याकुल किसान की व्याकुलता को ,हुलसाया -हर्षाया !

हल--बैलों की जुगल बंदी संग, धरती ने ली तान
झम -झमा झम , झम--झम ,झम--झम बरखा गाये गान !

हल चलाते कृषक अधरों पर ,खेल रही मुस्कान 
भूल गया वो ताप , पसीना , सूरज का अभिमान !

लहलहाती फसल करेगी जब ,अभिनन्दन ,सम्मान 
बीज -धरा का मिलन रखेगा ,परिश्रमी किसान का मान 
    - अरुणा 

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हर किसान कै फटी ज़ेब, पेटौ खाली
अपनी अपनी किस्मत के बटवारे हैं

कहैं मिठाई लाल कि ग़ाफ़िल सुगर भवा
दीवाली मा फूटे भाग हमारे हैं
    - चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’

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धरती के अंक से लग कर बिना कोई भेद किये 
सबकी एकता का सूत्र है जो भूमि पुत्र है वो 
       -यशवन्त माथुर

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मुँह अँधेरे किसान चल दिया
खेतो की ओर
जी तोड़ मेहनत नतीजा मुट्ठी भर
  - मीना भारद्वाज

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कीमत तो खूब बढ़ गई दिल्ली में धान की,
लेकिन विदा न हो सकी बेटी किसान की
    - सत्यप्रकाश

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और अंत में प्रस्तुत हैं मेरी यानी इस ब्लॉग लेखिका डॉ. वर्षा सिंह की ग़ज़लों से कुछ शेर ....

(1)
जहां पे आज रेत है, वहीं पे थी नदी कभी
जले थे प्रेम के दिये, हुई थी रोशनी कभी

उदास है किसान, कर्ज के तले, दबा हुआ
दुखों की छांव है वहां, रही जहां ख़ुशी कभी

अनेकता में एकता, ही हमारी शक्ति है
देशभक्ति की डगर, अलग नहीं रही कभी

जहां पे ”वर्षा” हो रही है, गोलियों की इन दिनों
वहां पे अम्नो-चैन की, बजेगी बांसुरी कभी
     - डॉ. वर्षा सिंह

और....

(2)

फांसी पे लटके बाप के शव से लिपट- लिपट
रोयी थी ज़ार-ज़ार वो बेटी किसान की

हल्कू हुआ है ज़िन्दा, हर रात पूस की
फ़सलों के बीच यादें टूटे मचान की

कुचले गए हैं कर्ज़ में कितने हसीन ख़्वाब
धरती सुना रही है गाथा लगान की
         - डॉ. वर्षा सिंह

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मंगलवार, सितंबर 29, 2020

दिल से दिल की शायरी | विश्व हृदय दिवस पर विशेष | डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

      प्रिय ब्लॉग पाठकों, आज विश्व हृदय दिवस है 
❤ यानी दिल का दिन 😊
❤ Happy World Heart Day ❤
     दरअसल दुनिया भर के तमाम लोगों को हृदयरोगों के प्रति जागरूक करने के उद्देश्य से वर्ष 2000 में 'विश्व हृदय दिवस' मनाने की शुरुआत की गई। पहले यह सितम्बर के अंतिम रविवार को मनाया जाता रहा था, लेकिन 2014 से इसे प्रति वर्ष 29 सितम्बर के दिन मनाया जाने लगा। 'विश्व स्वास्थ्य संगठन' (डब्ल्यूएचओ) की भागीदारी से स्वयंसेवी संगठन 'वर्ल्ड हार्ट फेडरेशन' हर साल 'विश्व हृदय दिवस' मनाता है।
इस वर्ष विश्व हृदय दिवस यानी World Heart Day की थीम है - 
Use heart to beat cardiovascular disease.
अर्थात् हृदय रोग को हराने के लिए दिल का उपयोग करें।
 यूं तो दिल के उपयोग की बात यहां भौतिक रूप से हृदय के स्वास्थ्य को ध्यान में रख कर की गई है लेकिन जब बात 'दिल' और 'दिल के रोग' की हो तो  .....और शायरों से बेहतर दिल के हालात से भला कौन वाकिफ़ होगा 😊

     जी हां, दुनिया में शायद ही कोई ऐसा शायर होगा जिसने दिल को ले कर कोई शायरी नहीं की होगी। यूं भी शायरी का वास्ता दिमाग़ से कम दिल से ही ज़्यादा होता है।
   तो चलिए इस ग़ज़लयात्रा में आज प्रस्तुत कर रही हूं 'दिल' से वाबस्ता कुछ चुनिंदा शेर और ग़ज़लें.....

दिल न होता तो कोई चीज़ न होती दुनिया 
दिल भी क्या चीज़ है दुनिया पे मिटा जाता है 
      ❤ - शफ़ी मंसूर

एक ही सी तन्हाई एक ही सा सन्नाटा 
दश्त क्या है दिल क्या है क्या तुझे बताऊँ मैं
   ❤ - जाफ़र शिराज़ी

दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है 
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है 
  ❤ - मिर्ज़ा ग़ालिब

दिल भी पागल है कि उस शख़्स से वाबस्ता है 
जो किसी और का होने दे न अपना रक्खे 
   ❤ - अहमद फ़राज़

नुकताचीं है, ग़मे-दिल उसको सुनाये न बने
क्या बने बात, जहां बात बनाये न बने

मैं बुलाता तो हूं उसको, मगर ऐ जज़बा-ए-दिल
उस पे बन जाए कुछ ऐसी, कि बिन आये न बने
  ❤ - मिर्ज़ा ग़ालिब

हर धड़कते पत्थर को लोग दिल समझते हैं 
उम्रें बीत जाती हैं दिल को दिल बनाने में 
  ❤ - बशीर बद्र

मोहब्बत रंग दे जाती है जब दिल दिल से मिलता है 
मगर मुश्किल तो ये है दिल बड़ी मुश्किल से मिलता है 
 ❤ - जलील मानिकपूरी

बुत-ख़ाना तोड़ डालिए मस्जिद को ढाइए 
दिल को न तोड़िए ये ख़ुदा का मक़ाम है 
 ❤ - हैदर अली आतिश

कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें 
इतनी जगह कहाँ है दिल-ए-दाग़-दार में 
  ❤ - बहादुर शाह ज़फ़र

दिल दे तो इस मिज़ाज का परवरदिगार दे 
जो रंज की घड़ी भी ख़ुशी से गुज़ार दे 
   ❤ - दाग़ देहलवी

आप दौलत के तराज़ू में दिलों को तौलें 
हम मोहब्बत से मोहब्बत का सिला देते हैं 
    ❤ - साहिर लुधियानवी

दिल चीज़ क्या है आप मिरी जान लीजिए 
बस एक बार मेरा कहा मान लीजिए 
  ❤ - शहरयार

शाम भी थी धुआँ धुआँ हुस्न भी था उदास उदास 
दिल को कई कहानियाँ याद सी आ के रह गईं 
 ❤ - फ़िराक़ गोरखपुरी

दर्द हो दिल में तो दवा कीजे 
और जो दिल ही न हो तो क्या कीजे 
 ❤ - मंज़र लखनवी

दिल पे आए हुए इल्ज़ाम से पहचानते हैं 
लोग अब मुझ को तिरे नाम से पहचानते हैं 
 ❤ - क़तील शिफ़ाई

कभी दिल में आरज़ू-सा, कभी मुँह में बद्दुआ-सा
मुझे जिस तरह भी चाहा, मैं उसी तरह रहा हूँ

मेरे दिल पे हाथ रक्खो, मेरी बेबसी को समझो
मैं इधर से बन रहा हूँ, मैं इधर से ढह रहा हूँ
    ❤ - दुष्यंत कुमार

बग़ावत के कमल खिलते हैं दिल की सूखी दरिया में।
मैं जब भी देखता हूँ आँख बच्चों की पनीली है।
       ❤ - अदम गोंडवी

दिल भी इक ज़िद पे अड़ा है किसी बच्चे की तरह
या तो सब कुछ ही इसे चाहिए या कुछ भी नहीं
     ❤ - राजेश रेड्डी

ज़ज़्बात के बिन, ग़ज़ल हो गयी क्या
बिना दिल के पिघले, ग़ज़ल हो गयी क्या

नहीं कोई मक़सद, नहीं सिलसिला है
बिना बात के ही, ग़ज़ल हो गयी क्या

नहीं कोई कासिद, नहीं कोई चिठिया
बिना कुछ लिखे ही, ग़ज़ल हो गयी क्या

जरूरत के पाबन्द हैं, लोग अब तो
बिना दिल मिले ही, ग़ज़ल हो गयी क्या
 ❤ -  डॉ. रूपचंद्र शास्त्री मयंक

खोल दें हम अपने दिल की डायरी।
फिर करें कुछ कच्ची-पक्की शायरी।

बोझ लें हम क्यूं भला, हर बात का
ज़िंदगी झिलमिल करें ज्यों फुलझरी।

आलमारी  में  रखे  कुछ  शब्द  ढूंढे
फिर  करें  बातों  में  कुछ  कारीगरी।

बोतलों  के  जिन्न-सी  हर  दुश्मनी
भूल सब आओ करें कुछ मसखरी।

कह रही सब से 'शरद', तुम भी सुनो
दिल की ख़ातिर भी रखो कुछ बेहतरी।
   ❤ - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

मेरी यादों में आके क्या करोगे
आस दिल में जगा के क्या करोगे

ज़माने का बड़ा छोटा सा दिल है
सबसे मिल के मिला के क्या करोगे

अगर राहों में ही वीरानियाँ हों
इतनी बातें बना के क्या करोगे

नफरतें और बढ़ जाएंगी दिल में
ऐसी बातों में आ के क्या करोगे

जो दिल नाआशना ही हो चुके हों
फ़क़त रिश्ता बना के क्या करोगे
  ❤ - शाहनवाज़ 'साहिल'

दर्दे दिल की लौ ने रौशन कर दिया सारा जहां  
इक अंधेरे में चमक उट्ठी कि जैसे बिजलियां
   ❤ - देवी नागरानी

ए मेरे दिल तुझे हुआ क्या है 
बस सुबह से बुझा बुझा सा है ।

क्या किसी ने तुझे कहा कुछ है 
पर किसी ने तुझे कहा क्या है । 
   ❤ - सुधेश

हवा पानी नही मिलता वो पत्ते सूख जाते हैं
लचीले हो नही सकते शजर वो टूट जाते हैं

मुझे आता नही यारों ज़माने का चलन कुछ भी
वो मेरी बात पे गुस्से में अक्सर रूठ जाते हैं

गुज़रती उम्र का होने लगा है कुछ असर मुझपे
जो अच्छे शेर होते हैं वो अक्सर छूट जाते हैं

अतिथि देव भव अच्छा बहुत सिद्धांत है लेकिन
अतिथि बन के आए जो मुसाफिर लूट जाते हैं

न खोलो तुम पुरानी याद के ताबूत को फिर से
कई लम्हे निकल के पेड़ पे फिर झूल जाते हैं

हमारे दिल के दरवाजे पे तुम दस्तक नही देना
पुराने घाव हल्की चोट से ही फूट जाते हैं
    ❤ - दिगंबर नासवा

दिवाली थी तो चरागों का एहतराम किया,
दिल अपने जलाए और तेरे नाम किया।
   ❤ - नीतिश तिवारी

फेसबुक  से  यूँ   हटाना  बस में था ।
अब जरा  दिल  से हटाकर  देखिये ।।

आप मेरे  इश्क़  के  काबिल तो  हैं ।
हो सके तो  दिल  मिलाकर देखिये ।।

दीन  हो  जाए   न  ये  बर्बाद  अब ।
मत  हमें  नज़रें  झुकाकर  देखिये ।।

कत्ल   होने   का  इरादा  था  मेरा ।
बेवजह  मत  आजमाकर  देखिये ।।

धड़कने   देंगी  गवाही  फ़िक्र   की ।
खत मेरा दिल से लगाकर  देखिये ।।
     ❤ - नवीन मणि त्रिपाठी

चाहता तो वह मुझे दिल में भी रख सकता था
मुनासिब हरेक को चार दीवारियाँ नहीं होती

कुछ तो होता होगा असर दुआओं का भी
सिर्फ दवाओं से ठीक बीमारियाँ नहीं होती
   ❤ - कविता रावत
   
अपना मक़ाम दिल के तेरे बीचो बीच था
मुश्क़िल हमें था जाना वहाँ तक मगर गए

हो उस निगाहे लुत्फ़ की तारीफ़ किस तरह
जिसकी बिनाहे शौक नज़ारे सँवर गए

जाँबर सभी थे जान बचाकर लिए निकल
हम ही थे इक जो तेरी अदाओं पे मर गए

तो फिर नहीं बुलाएँगे ता’उम्र आपको
ग़ाफ़िल जी आप दिल से हमारे अगर गए
  ❤ -  चन्द्र भूषण मिश्र ग़ाफ़िल


तुझे चाहना, तुझे सोचना अच्छा  लगता है, 
मात्र कल्पनाओं में मिलना अच्छा लगता है!! 

बंद आँख से स्वप्न मिलन के प्रायः हैं देखे,
खुली पलक से तेरा सपना अच्छा  लगता है!! 

देखा नहीं तुझे है अब तक फिर भी जाने क्यों, 
तेरा नाम जुबां पे रखना अच्छा लगता है!!

अपने गीतों में, कविता में क्यों न तुझे ढालूँ, 
ग़ज़ल बनाकर दिल पर लिखना अच्छा लगता है!!

हर धड़कन में तू शामिल है, प्रेम रतन धन तू,  
"तू है मात्र हमारी" कहना, अच्छा लगता है..!! 

तेरे साथ बैठ कर सागर तट पर रातों में, 
उठती गिरती लहरें गिनना अच्छा लगता है..!! 

कुछ अपने कुछ तेरे मन की बातें कानों में,
धीरे-धीरे कहना सुनना अच्छा लगता है..!!
   ❤ - विद्या भूषण मिश्र " भूषण"


और अंत में प्रस्तुत है मेरी यानी इस ब्लॉग लेखिका डॉ. वर्षा सिंह की एक ग़ज़ल -

चले थे साथ, अब राहें अलग अपनी जुदा क्यों हैं ।
नहीं दिल की कोई ग़लती तो पाता ये सज़ा क्यों है।

मुहब्बत के  जुनू वाली  ये  बातें  तो  पुरानी  हैं
ये तूफां-सा मगर सीने में आखि़र अब उठा क्यों हैं।

कोई  आवाज़ देता है  किसी को़,  चौंकती हूं  मैं
पुकारा है  मुझे उसने  ये  धोखा-सा हुआ क्यों है।

न जाने कब से उसने तो अलग दुनिया बसा ली है
मेरे दिल के मकां में वो अभी तक यूं बसा क्यों है।

वो ग़म में है, रहे, मुझको भला क्यों फि़क्र हो उसकी
मेरी आंखों से आंसू का ये  दरिया-सा बहा क्यों है।

बिना बरसे ही रह जाना लिखा किस्मत में है इसकी
कोई बतलाए आखिर ये  उठी ‘वर्षा’, घटा  क्यों है।
           ❤ - डॉ वर्षा सिंह

World Heart Day, Ghazal Yatra

मंगलवार, सितंबर 22, 2020

कोई पूछे कि ये ग़ज़ल क्या है | शायरी में ग़ज़ल | ग़ज़ल पर शायरी | डॉ. वर्षा सिंह


डॉ. वर्षा सिंह 
                           
कोई पूछे कि ये ग़ज़ल क्या है, तो मैं कह दूं कि दिल का दरिया है।
अपनी कहने और उसकी सुनने का, ख़ूबसूरत सा एक ज़रिया है।
                - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

  कवयित्री, लेखिका डॉ. (सुश्री) शरद सिंह का यह शेर ग़ज़ल को परिभाषित करने  वाला है। वैसे ये ग़ज़ल आख़िर है क्या ? तो इस प्रश्न के उत्तर में यही कहा जा सकता है कि यह काव्य की एक विधा है। चूंकि ग़ज़ल का अर्थ है प्रेमी-प्रेमिका का वार्तालाप अतः पहले गजल प्रेम की अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त माध्यम थी, किन्तु धीरे-धीरे वक़्त के साथ इसमें बदलाव आया और प्रेम के अलावा अन्य विषय भी इसमें शामिल हो गए। ग़ज़ल फ़ारसी से उर्दू में आई, फिर उर्दू से हिन्दी में और फिर एक लम्बा भाषाई सफ़र तय करके क्षेत्रीय बोलियों में आ चुकी है। दुष्यंत कुमार ने अपनी हिन्दी ग़ज़लों से ग़ज़ल की दुनिया को नई पहचान दी। यानी अब वर्तमान में भाषाई बंधन से मुक्त हो चुकी ग़ज़ल।

'हफ़ीज़' अपनी बोली मोहब्बत की बोली
न उर्दू न हिन्दी न हिन्दोस्तानी
 - हफ़ीज़ जालंधरी

आज मैं यहां प्रस्तुत कर रही हूं कुछ ऐसे शेर और ग़ज़लें, जिनमें शायर ने अपने शेरों में ग़ज़ल को अपनी तरह से पारिभाषित करने के साथ ही शायरी, ग़ज़ल और शेर शब्द का बड़ी ख़ूबसूरती से इस्तेमाल किया है।

हम से पूछो कि ग़ज़ल क्या है ग़ज़ल का फ़न क्या 
चंद लफ़्ज़ों में कोई आग छुपा दी जाए 
- जां निसार अख़्तर

बक़द्रे शौक़ नहीं ज़र्फे तंगना-ए-ग़ज़ल।
कुछ और चाहिये वसुअत मेरे बयां के लिये। 
  - मिर्जा ग़ालिब
अर्थात् मेरे मन की उत्कट भावनाओं को खुलकर व्यक्त करने में ग़ज़ल का पटल बड़ा ही संकीर्ण हैं। मुझे साफ साफ कहने के लिये किसी और विस्तृत माध्यम की आवश्यकता है।

अपने लहजे की हिफ़ाज़त कीजिए 
शेर हो जाते हैं ना-मालूम भी 
- निदा फ़ाज़ली

डाइरी में सारे अच्छे शेर चुन कर लिख लिए 
एक लड़की ने मिरा दीवान ख़ाली कर दिया 
- ऐतबार साजिद

मुझ को शायर न कहो 'मीर' कि साहब मैं ने 
दर्द ओ ग़म कितने किए जम्अ तो दीवान किया 
- मीर तक़ी मीर

हमसे पूछो के ग़ज़ल मांगती है कितना लहू
सब समझते हैं ये धंधा बड़े आराम का है

प्यास अगर मेरी बुझा दे तो मैं मानूं वरना ,
तू समन्दर है तो होगा मेरे किस काम का है
- राहत इंदौरी

हज़ारों शेर मेरे सो गए काग़ज़ की क़ब्रों में 
अजब माँ हूँ कोई बच्चा मिरा ज़िंदा नहीं रहता 
- बशीर बद्र

छुपी है अन-गिनत चिंगारियाँ लफ़्ज़ों के दामन में 
ज़रा पढ़ना ग़ज़ल की ये किताब आहिस्ता आहिस्ता 
- प्रेम भण्डारी


मैं जिसे ओढ़ता बिछाता हूँ 
वो ग़ज़ल आप को सुनाता हूँ 

एक जंगल है तेरी आँखों में 
मैं जहाँ राह भूल जाता हूँ 

तू किसी रेल सी गुज़रती है 
मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ 

हर तरफ़ एतराज़ होता है 
मैं अगर रौशनी में आता हूँ 

एक बाज़ू उखड़ गया जब से 
और ज़्यादा वज़न उठाता हूँ 

मैं तुझे भूलने की कोशिश में 
आज कितने क़रीब पाता हूँ 

कौन ये फ़ासला निभाएगा 
मैं फ़रिश्ता हूँ सच बताता हूँ 

- दुष्यंत कुमार      

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
                      

ग़ज़ल में काफि़या-मतला मुहब्बत से सजाना है
हसीं लफ़्ज़ों की माला को करीने से बनाना है

जहाँ में प्यार का इज़हार करना है कठिन अब तो
अलग सूरत, अलग सीरत, बड़ा ज़ालिम जमाना है

बनावट में मिलावट के निराले ढंग मिलते हैं
सियासत ने सियासत से भरा अपना खज़ाना है

गुज़ारा भूख में जीवन जिन्होंने ग़ुरबतों में ही
ग़रीबों का बड़ी मुश्किल से बनता अशियाना है

नहीं टूटे कभी भी सिलसिला अशआर का इसमें
ग़जल में ‘रूप’ का मुश्किल हुआ मक्ता लगाना है

- डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक

  डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
                   

मैं ग़ज़ल की एक क़िताब हूं, मुझे साथ अपने रखा करो।
मिरी सांस-सांस है शायरी, मुझे तुम अदब से पढ़ा करो।

ये बहर की धूप है सुनहरी, ग़मे-ए-बारिशों से धुली हुई
इसे गर समझ ना पाओ तुम, ज़रा चांदनी में जला करो।

किसी रोज़ बैठो सुकून से, यूं ही हाथ, हाथ में डाल के
कभी अपने-आप से इस तरह, हरहाल तुम भी मिला करो।

मिरी चाहतों के क़ाफ़िए,  हो भूल जाने का डर "शरद"
इन्हें नोटबुक की बजाए तुम,  हथेलियों पे लिखा करो।

- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

नसीम शाहजहांपुरी

                      

हुस्न माइल ब-सितम हो तो ग़ज़ल होती है 
इश्क़ बा-दीदा-ए-नम हो तो ग़ज़ल होती है 

फूल बरसाएँ कि वो हँस के गिराएँ बिजली 
कोई भी ख़ास करम हो तो ग़ज़ल होती है 

कभी दुनिया हो कभी तुम कभी तक़दीर ख़िलाफ़ 
रोज़ इक ताज़ा सितम हो तो ग़ज़ल होती है 

दामन-ए-ज़ब्त छुटे चूर हो या शीशा-ए-दिल 
हादसा कोई अहम हो तो ग़ज़ल होती है 

शिकन-ए-गेसू-ए-दौराँ ही पे मौक़ूफ़ नहीं 
उन की ज़ुल्फ़ों में भी ख़म हो तो ग़ज़ल होती है 

दर्द इस पर भी न कम हो तो ग़ज़ल होती है
जाम हो मय हो सनम हो तो ग़ज़ल होती है 

- नसीम शाहजहांपुरी

पंकज सुबीर
                            

 चाँद में है कोई परी शायद

इस लिए है ये चाँदनी शायद


लोग उस को मसीहा कहते थे

वैसे वो भी था आदमी शायद


दिल का दरवाज़ा खोल रक्खा है

यूँ ही आ जाएगा कोई शायद


साँस आती है साँस जाती है

इस को कहते हैं ज़िंदगी शायद


आप का ज़िक्र हो मुसलसल हो

बस यही तो है शाइ'री शायद


मेरे आँसू तुम्हारी आँखों में

अब भी बाक़ी है दोस्ती शायद

              - पंकज सुबीर

विजय वाते
                           

दर्द में उम्र बसर हो तो ग़ज़ल होती है
या कोई साथ अगर हो तो ग़ज़ल होती है

तेरा पैगाम मगर रोज़ कहाँ आता है
तेरे आने की ख़बर हो तो ग़ज़ल होती है

यूँ तो रोते हैं सभी लोग यहाँ पर लेकिन
आँख मासूम की तार हो तो ग़ज़ल होती है

हिंदी उर्दू में कहो या किसी भाषा मे कहो
बात का दिल पे असर हो तो ग़ज़ल होती है

ग़ज़लें अख़बार की ख़बरों की तरह लगती है
हाँ तेरा ज़िक्र अगर हो तो ग़ज़ल होती है

- विजय वाते

दिगम्बर नासवा
                            

मखमली से फूल नाज़ुक पत्तियों को रख दिया
शाम होते ही दरीचे पर दियों को रख दिया

भीड़ में लोगों की दिन भर हँस के बतियाती रही 
रास्ते पर कब न जाने सिसकियों को रख दिया

इश्क़ के पैगाम के बदले तो कुछ भेजा नहीं
पर मेरी खिड़की पे उसने तितलियों को रख दिया

नाम जब आया मेरा तो फेर लीं नज़रें मगर
भीगती गजलों में मेरी शोखियों को रख दिया

चिलचिलाती धूप में तपने लगी जब छत मेरी
उनके हाथों की लिखी कुछ चिट्ठियों को रख दिया 
      - दिगम्बर नासवा

वशिष्ठ अनूप
                           

निष्कलुष प्यार की भीनी-भीनी महक, ताजगी जैसे बच्चों की निश्छल हँसी,
इसमें शामिल है माटी का कुछ सोंधापन, खूँ-पसीने से हमने सँवारी गजल।

प्यार मीरा घनानंद रसखान का, पीर इसमें कबीरा निराला की है,
आज है अपनी कुटिया की रानी बनी, कल भिखारिन-सी थी दसदुआरी गजल।
              - वशिष्ठ अनूप

और अंत में मेरी यानी इस ब्लॉग की लेखिका डॉ. वर्षा सिंह की ग़ज़ल जो ग़ज़ल को ही समर्पित है -
  
 डॉ. वर्षा सिंह
                         

स्याह रातों में इक रोशनी है ग़ज़ल
धूप में छांह बन कर मिली है ग़ज़ल

भिन्न मिसरे बंधे एक ही डोर से
एकता की अनोखी लड़ी है ग़ज़ल

फ़ासलों में दिलासा दिलाती है ये
वस्ल की वादियों में नदी है ग़ज़ल

दिल के बहलाव का सिर्फ़ सामान है
तो किसी के लिए ज़िन्दगी है ग़ज़ल

क़ाफ़ियों से रदीफ़ों की है दोस्ती
हर बहर में संवर कर सजी है ग़ज़ल

दर्द-दुख है, समस्या ज़माने की है
लोग कहते इसे ये नयी है ग़ज़ल

फ़ारसी, अरबी, उर्दू से हिन्दी हुई
अब बुंदेली के रंग में  रंगी  है ग़ज़ल

मीर, ग़ालिब से दुष्यंत के बाद तक
आज "वर्षा" के दिल में बसी है ग़ज़ल

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